योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

मान्यताएं बदलती रहती हैं और फिर एक देश तथा एक ही काल में विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न जातियों की नैतिक मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं। उनमें पाप-पुण्य ढूंढ़ना व्यर्थ है।

इस यात्रा में और फिर पश्चिम की यात्रा में जैसे-जैसे उनके पूर्वग्रह टूटते रहे वैसे-वैसे वे मनुष्यों के साथ अपने संबंधों में सामंजस्य स्ािापित करते रहे। आगामी चार-पांच बरसों में उनके भीतर जो परिवर्तन आया, उसका उल्लेख अपने 6 जुलाई, 1896 के पत्र में उन्होंने यों किया है:


316 of 1197

मान्यताएं बदलती रहती हैं और फिर एक देश तथा एक ही काल में विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न जातियों की नैतिक मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं। उनमें पाप-पुण्य ढूंढ़ना व्यर्थ है।

इस यात्रा में और फिर पश्चिम की यात्रा में जैसे-जैसे उनके पूर्वग्रह टूटते रहे वैसे-वैसे वे मनुष्यों के साथ अपने संबंधों में सामंजस्य स्ािापित करते रहे। आगामी चार-पांच बरसों में उनके भीतर जो परिवर्तन आया, उसका उल्लेख अपने 6 जुलाई, 1896 के पत्र में उन्होंने यों किया है:


316 of 1197