‘‘बीस वर्ष की अवस्था में मैं अत्यन्त असहिष्णु और कट्टर था। कलकत्ता में सड़कों के जिस किनारे पर थियेटर है, मैं उस ओर के पैदल-मार्ग ही से नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूं और उनसे तिरस्कार का एक शब्द भी कहने का विचार मेरे मन में नहीं आएगा।’’ (वि.सा., पंचम खंड, पृष्ठ 353)
उन्होंने शोषित व उत्पीड़ित वर्गों के अभाव और अपमान में हिस्सा बटाया, उनके दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द
‘‘बीस वर्ष की अवस्था में मैं अत्यन्त असहिष्णु और कट्टर था। कलकत्ता में सड़कों के जिस किनारे पर थियेटर है, मैं उस ओर के पैदल-मार्ग ही से नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूं और उनसे तिरस्कार का एक शब्द भी कहने का विचार मेरे मन में नहीं आएगा।’’ (वि.सा., पंचम खंड, पृष्ठ 353)
उन्होंने शोषित व उत्पीड़ित वर्गों के अभाव और अपमान में हिस्सा बटाया, उनके दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द