आप संन्यासी हैं-शोकार्त होना आपको शोभा नहीं देता।’’ विवेकानन्द ने उन्हें उत्तर दिया था, ‘‘क्या आप सोचते हैं कि संन्यासी के हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती? प्रकृत संन्यासी दूसरों के लिए साधारण व्यक्ति की अपेक्षा अधिक सहानुभूति का अनुभव करते हैं और मैं तो मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं हूं। वे मेरे गुरू-भाई जो थे। उनके वियोग में जो मैं कातर हूं इसमें विचित्र बात क्या है? पत्थर की तरह अनुभूतिशून्य संन्यासी का जीवन मुझे नहीं चाहिए।’’
आप संन्यासी हैं-शोकार्त होना आपको शोभा नहीं देता।’’ विवेकानन्द ने उन्हें उत्तर दिया था, ‘‘क्या आप सोचते हैं कि संन्यासी के हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती? प्रकृत संन्यासी दूसरों के लिए साधारण व्यक्ति की अपेक्षा अधिक सहानुभूति का अनुभव करते हैं और मैं तो मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं हूं। वे मेरे गुरू-भाई जो थे। उनके वियोग में जो मैं कातर हूं इसमें विचित्र बात क्या है? पत्थर की तरह अनुभूतिशून्य संन्यासी का जीवन मुझे नहीं चाहिए।’’