योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



70 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

और वे संन्यासी वेश में हमेशा अनुभूतिशील मनुष्य बने रहे, उनका हृदय कोमल से कोमलतर होता चला गया। जिसमें भारत की समूची शोषित, उत्पीड़ित, दलित और दरिद्र जनता की पीड़ा समा गई और फिर इस पीड़ा से वे आजीवन विक्षुब्ध और व्याकुल रहे।

सितम्बर, 1892 में वे बंबई से पूना जा रहे थे। रेलगाड़ी के जिस डिब्बे में वे बैठे थे, उसमें तीन महाराष्ट्रीय युवक भी थे जो संन्सास के विषय पर गरमा-गरम बहस कर रहे थे। उनमें


320 of 1197



70 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

और वे संन्यासी वेश में हमेशा अनुभूतिशील मनुष्य बने रहे, उनका हृदय कोमल से कोमलतर होता चला गया। जिसमें भारत की समूची शोषित, उत्पीड़ित, दलित और दरिद्र जनता की पीड़ा समा गई और फिर इस पीड़ा से वे आजीवन विक्षुब्ध और व्याकुल रहे।

सितम्बर, 1892 में वे बंबई से पूना जा रहे थे। रेलगाड़ी के जिस डिब्बे में वे बैठे थे, उसमें तीन महाराष्ट्रीय युवक भी थे जो संन्सास के विषय पर गरमा-गरम बहस कर रहे थे। उनमें


320 of 1197