से दो नौजवान पाश्चात्य जीवन-पद्वति की श्रेष्ठता को मानने वाले रानाडे आदि सुधारकों के स्वर में स्वर मिलाकर संन्यास को ढोंग तथा व्यर्थ बता रहे थे। लेकिन तीसरा नौजवान प्राचीन संन्यास की महिमा का गुणगान करके प्रतिवाद कर रहा था। विवेकानन्द कुछ देर चुप बैठे रहे इन नौजवानों का तर्क-वितर्क सनते रहे। अंत में वे भी तीसरे नौजवान का पक्ष लेकर बहस में उतर पड़े। उन्होंने धीर भाव से समझाया कि विभिन्न प्रान्तों में भ्रमण करने वाले संन्यासियों
से दो नौजवान पाश्चात्य जीवन-पद्वति की श्रेष्ठता को मानने वाले रानाडे आदि सुधारकों के स्वर में स्वर मिलाकर संन्यास को ढोंग तथा व्यर्थ बता रहे थे। लेकिन तीसरा नौजवान प्राचीन संन्यास की महिमा का गुणगान करके प्रतिवाद कर रहा था। विवेकानन्द कुछ देर चुप बैठे रहे इन नौजवानों का तर्क-वितर्क सनते रहे। अंत में वे भी तीसरे नौजवान का पक्ष लेकर बहस में उतर पड़े। उन्होंने धीर भाव से समझाया कि विभिन्न प्रान्तों में भ्रमण करने वाले संन्यासियों