ही ने जातीय जीवन के उच्च आदर्शों का प्रचार समस्त भारत में किया है। भारतीय संस्कृति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति संन्यासी ही है, जो शिष्य परम्परा द्वारा विघ्न-बाधाओं के बीच इतने दिनों तक राष्ट्रीय आदर्शों की रक्षा करता आया है। हां, ठीक है ढोंगी तथा स्वार्थी लोगों के हाथों संन्यास बीच-बीच में लांछित और विकृत भी हुआ है, पर इसके लिए समस्त संन्यासी सम्प्रदाय को ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं। अंगे्रजी बोलने वाले इन संन्यासी विद्वता
ही ने जातीय जीवन के उच्च आदर्शों का प्रचार समस्त भारत में किया है। भारतीय संस्कृति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति संन्यासी ही है, जो शिष्य परम्परा द्वारा विघ्न-बाधाओं के बीच इतने दिनों तक राष्ट्रीय आदर्शों की रक्षा करता आया है। हां, ठीक है ढोंगी तथा स्वार्थी लोगों के हाथों संन्यास बीच-बीच में लांछित और विकृत भी हुआ है, पर इसके लिए समस्त संन्यासी सम्प्रदाय को ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं। अंगे्रजी बोलने वाले इन संन्यासी विद्वता