की बातचीत के समय वे भी मौजुद थे। उन दोनों में यह तय पाया कि तिलक राजनीति के मंच से और विवेकानन्द धर्म के माध्यम से राष्ट्र को जगाएंगे।
विवेकानन्द ने शंकराचार्य के महाभाष्य का कुछ भाग इस यात्रा में राजपूताना के नारायण दास से पढ़ लिया था और जो शेष था, वह पोरबंदर के विख्यात विद्वान पंडित शंकर पांडुरंग से पढ़ा। उसे समाप्त करके वे व्यास के वेदान्त सूत्र का अध्ययन करने लगे। इसी बीच में वहां पंडितों की एक विचार सभा हुईं एकत्रित
की बातचीत के समय वे भी मौजुद थे। उन दोनों में यह तय पाया कि तिलक राजनीति के मंच से और विवेकानन्द धर्म के माध्यम से राष्ट्र को जगाएंगे।
विवेकानन्द ने शंकराचार्य के महाभाष्य का कुछ भाग इस यात्रा में राजपूताना के नारायण दास से पढ़ लिया था और जो शेष था, वह पोरबंदर के विख्यात विद्वान पंडित शंकर पांडुरंग से पढ़ा। उसे समाप्त करके वे व्यास के वेदान्त सूत्र का अध्ययन करने लगे। इसी बीच में वहां पंडितों की एक विचार सभा हुईं एकत्रित