इस सभा के बाद विवेकानन्द के अध्यापक पंडित शंकर पांडुरंग ने उनसे कहा, ‘‘स्वामी जी, मैं नहीं समझता कि इस देश में धर्म-प्रचार द्वारा आप कुछ कर पाएंगे।
समय और शक्ति व्यर्थ में मत गंवाइए। आप पाश्चात्य देशों में जाइए। वहां के लोग प्रतिभा और योग्यता का सम्मान करना जानते हैं। अपने उदार विचारों के कारण आप वहां अवश्य सफल होंगे।’’
स्वामी जी ने तनिक रूककर उत्तर दिया, ‘‘हा, एक दिन प्रभात में मैं समुद्र तट पर खड़ा तरंगों का नृत्य
इस सभा के बाद विवेकानन्द के अध्यापक पंडित शंकर पांडुरंग ने उनसे कहा, ‘‘स्वामी जी, मैं नहीं समझता कि इस देश में धर्म-प्रचार द्वारा आप कुछ कर पाएंगे।
समय और शक्ति व्यर्थ में मत गंवाइए। आप पाश्चात्य देशों में जाइए। वहां के लोग प्रतिभा और योग्यता का सम्मान करना जानते हैं। अपने उदार विचारों के कारण आप वहां अवश्य सफल होंगे।’’
स्वामी जी ने तनिक रूककर उत्तर दिया, ‘‘हा, एक दिन प्रभात में मैं समुद्र तट पर खड़ा तरंगों का नृत्य