योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

देख रहा था। एकाएक मन में आया कि मुझे इस विक्षुब्ध समुद्र को लांघकर सुदूर विदेश में जाना चाहिए। देखें, यह साध कब और कैसे पूरी होती है?’’

फिर जब वे मैसूर के राजभवन में अतिथि थे तो पता चला कि शिकागों में धर्म-सभा होने जा रही है। मैसूर का राजा वहां जाने का सारा खर्च वहन करने को तैयार था। स्वामी जी ने उनसे कहा, ‘‘महाराज! मैंने हिमालय से कन्याकुमारी तक के भ्रमण का संकल्प ले रखा है। पहले मुझे इसे पूरा करना है। फिर क्या करना और कहां जाना है, उसके बाद ही सोचूंगा।’’


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देख रहा था। एकाएक मन में आया कि मुझे इस विक्षुब्ध समुद्र को लांघकर सुदूर विदेश में जाना चाहिए। देखें, यह साध कब और कैसे पूरी होती है?’’

फिर जब वे मैसूर के राजभवन में अतिथि थे तो पता चला कि शिकागों में धर्म-सभा होने जा रही है। मैसूर का राजा वहां जाने का सारा खर्च वहन करने को तैयार था। स्वामी जी ने उनसे कहा, ‘‘महाराज! मैंने हिमालय से कन्याकुमारी तक के भ्रमण का संकल्प ले रखा है। पहले मुझे इसे पूरा करना है। फिर क्या करना और कहां जाना है, उसके बाद ही सोचूंगा।’’


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