अक्टूबर में वे मैसूर से चले। कोचीन और मदुरा होते हुए दिसम्बर में जब वे कन्याकुमारी पहुंचे तो बहुत थके हुए थे। यात्रा में अंतिम चरण तक पहुंचने के लिए उनके पास नाव का किराया न था। वे समुद्र में कूद पड़े और शार्कों से भरे जलडमरू मध्य को तैरकर पार किया। धरती के अंतिम छोर पर बने स्तम्भ की छत पर चढ़कर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली तो उनके भीतर आनन्द की तरंगें उठ रही थी।
सामने समुद्र, पीछे पहाड़, मैदान, नदिया, महल, मंदिर,
अक्टूबर में वे मैसूर से चले। कोचीन और मदुरा होते हुए दिसम्बर में जब वे कन्याकुमारी पहुंचे तो बहुत थके हुए थे। यात्रा में अंतिम चरण तक पहुंचने के लिए उनके पास नाव का किराया न था। वे समुद्र में कूद पड़े और शार्कों से भरे जलडमरू मध्य को तैरकर पार किया। धरती के अंतिम छोर पर बने स्तम्भ की छत पर चढ़कर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली तो उनके भीतर आनन्द की तरंगें उठ रही थी।
सामने समुद्र, पीछे पहाड़, मैदान, नदिया, महल, मंदिर,