के जीवगण उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करना तो दूर रहा, पाश्चात्य शिक्षा से स्वेच्छाचारी बन उन्हें छोड़कर नये-नये समाज व सम्प्रदायों की स्थापना
72 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
द्वारा हिन्दू धर्म के मस्तिष्क पर अग्निमय अभिशापों की वर्षा करने में लगे हुए है। धर्म केवल प्राणविहीन आचार नियामों की समष्टि व कुसंस्कारों की लीला भूमि है। परिणाम में वर्तमान भारत प्रायः आशा,उद्यम, आनन्द व उत्साह के बिखरे हुए ध्वंस अवशेषों से पूर्ण महाश्मशान बना हुआ है।
के जीवगण उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करना तो दूर रहा, पाश्चात्य शिक्षा से स्वेच्छाचारी बन उन्हें छोड़कर नये-नये समाज व सम्प्रदायों की स्थापना
72 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
द्वारा हिन्दू धर्म के मस्तिष्क पर अग्निमय अभिशापों की वर्षा करने में लगे हुए है। धर्म केवल प्राणविहीन आचार नियामों की समष्टि व कुसंस्कारों की लीला भूमि है। परिणाम में वर्तमान भारत प्रायः आशा,उद्यम, आनन्द व उत्साह के बिखरे हुए ध्वंस अवशेषों से पूर्ण महाश्मशान बना हुआ है।