योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



‘‘...वे सोचने लगे, हम लाखों संन्यासी इन्हीं के अन्न से जीवन धारण करते हुए उनके लिए क्या कर रहे हैं? इन्हें दर्शन शास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं? धिक्कार है! भगवान श्रीरामकृष्ण देव कहा करते थे, ‘खाली पेट में धर्म नहीं होता, साधारण अन्न व मोटे वस्त्र की व्यवस्था चाहिए।’ भूखे व्यक्ति को धर्मोपदेश देने के लिए अग्रसर होना मूर्खता मात्र है। धर्म उनमें यथेष्ट है। आवश्यकता है शिक्षा विस्तार की, चाहिए भोजन, वस्त्र की व्यवस्था


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‘‘...वे सोचने लगे, हम लाखों संन्यासी इन्हीं के अन्न से जीवन धारण करते हुए उनके लिए क्या कर रहे हैं? इन्हें दर्शन शास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं? धिक्कार है! भगवान श्रीरामकृष्ण देव कहा करते थे, ‘खाली पेट में धर्म नहीं होता, साधारण अन्न व मोटे वस्त्र की व्यवस्था चाहिए।’ भूखे व्यक्ति को धर्मोपदेश देने के लिए अग्रसर होना मूर्खता मात्र है। धर्म उनमें यथेष्ट है। आवश्यकता है शिक्षा विस्तार की, चाहिए भोजन, वस्त्र की व्यवस्था


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