परन्तु यह कैसे सम्भव होगा? इस कार्य में अग्रसर होने के लिए प्रथम चाहिए मनुष्य और द्वितीय धन।’’ (विवेकानन्द चरित, मृ. 198-99)
1892 के अंत में कन्याकुमारी के मंदिर के एक शिला पर बैठे हुए विवेकानन्द, 1888 के आरम्भ में वराहनगर मठ से देश-भ्रमण पर रवाना होने वाले विवेकानन्द से एकदम भिन्न तो नहीं, लेकिन बहुत भिन्न थे। चार बरस से थोड़े समय में उनका जो अद्भुत मानसिक विकास हुआ, वह केवल जनसम्पर्क द्वारा ही सम्भव था। उन्होंने देश
परन्तु यह कैसे सम्भव होगा? इस कार्य में अग्रसर होने के लिए प्रथम चाहिए मनुष्य और द्वितीय धन।’’ (विवेकानन्द चरित, मृ. 198-99)
1892 के अंत में कन्याकुमारी के मंदिर के एक शिला पर बैठे हुए विवेकानन्द, 1888 के आरम्भ में वराहनगर मठ से देश-भ्रमण पर रवाना होने वाले विवेकानन्द से एकदम भिन्न तो नहीं, लेकिन बहुत भिन्न थे। चार बरस से थोड़े समय में उनका जो अद्भुत मानसिक विकास हुआ, वह केवल जनसम्पर्क द्वारा ही सम्भव था। उन्होंने देश