की धरती का चप्पा-चप्पा अपनी देह से स्पर्श किया और राष्ट्रीय समस्याओं को प्रत्यक्ष देखा। पुस्तक-ज्ञान अनुभूत सत्य मंे और कल्पना ठोस यथार्थ में परिणित हुई।
वे यह सोचकर चले थे कि धर्मप्रचार द्वारा भारत को सोते से जगाना और विभिन्न मतवादों मंे विभाजित जातियों, सम्प्रदायों तथा धर्मों में अद्वैत वेदान्त की शिक्षा द्वारा एकता स्ािापित करना है। यही काम है, जो रामकृष्ण परमहंस उन्हें सौंप गए हैं।
पर इस देश भ्रमण के दौरान उन्होंने
की धरती का चप्पा-चप्पा अपनी देह से स्पर्श किया और राष्ट्रीय समस्याओं को प्रत्यक्ष देखा। पुस्तक-ज्ञान अनुभूत सत्य मंे और कल्पना ठोस यथार्थ में परिणित हुई।
वे यह सोचकर चले थे कि धर्मप्रचार द्वारा भारत को सोते से जगाना और विभिन्न मतवादों मंे विभाजित जातियों, सम्प्रदायों तथा धर्मों में अद्वैत वेदान्त की शिक्षा द्वारा एकता स्ािापित करना है। यही काम है, जो रामकृष्ण परमहंस उन्हें सौंप गए हैं।
पर इस देश भ्रमण के दौरान उन्होंने