योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अपनी आंखों से देखा कि भारत की जीर्ण-शीर्ण जनता अज्ञान के अंधकार में, अन्न के अभाव में भूख से तड़प् रही है। धर्म बाद की बात है, पहला काम उसके अज्ञान और भूख को दूर करना है।

अपनी इस यात्रा में उन्होंने धनी, राजा, महाराजा से द्वार-द्वार जाकर प्रार्थना की थी कि देश के गरीबों, दीन-दुखियों की सहायता करो। पर किसी ने उनकी प्रार्थना पर कान नहीं धरा और मौखिक सहानुभूति के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा।

अब उन्होंने सोचा कि पाश्चात्य देशों में पास धन बहुत है,


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अपनी आंखों से देखा कि भारत की जीर्ण-शीर्ण जनता अज्ञान के अंधकार में, अन्न के अभाव में भूख से तड़प् रही है। धर्म बाद की बात है, पहला काम उसके अज्ञान और भूख को दूर करना है।

अपनी इस यात्रा में उन्होंने धनी, राजा, महाराजा से द्वार-द्वार जाकर प्रार्थना की थी कि देश के गरीबों, दीन-दुखियों की सहायता करो। पर किसी ने उनकी प्रार्थना पर कान नहीं धरा और मौखिक सहानुभूति के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा।

अब उन्होंने सोचा कि पाश्चात्य देशों में पास धन बहुत है,


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