योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अपनी आंखों से जन समुदाय की भयंकर दरिद्रता और पीड़ा देखने के वेदना मैंने अनुभव की है, आंसू सम्भाल नहीं सका हूं मैं, अब मैं दृढ़ता से कह सकता हूं कि उस जनसमुदाय का क्लेश, उसका काठिन्य दूर करेन का यत्न किए बिना उसको धर्म-शिक्षा देना सर्वथा व्यर्थ है। इसी कारण भारत के दरिद्रजनों की मुक्ति का साधन जुटाने मैं अब अमेरिका जा रहा हूं।’’

31 मई, 1893 को वे बम्बई से अमेरिका के लिए जहाज़ पर सवार हुए। उस समय उन्होंने रेशमी अंगरखा पहन रखा था और सिर पर गेरूए रंग की पगड़ी थी।


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अपनी आंखों से जन समुदाय की भयंकर दरिद्रता और पीड़ा देखने के वेदना मैंने अनुभव की है, आंसू सम्भाल नहीं सका हूं मैं, अब मैं दृढ़ता से कह सकता हूं कि उस जनसमुदाय का क्लेश, उसका काठिन्य दूर करेन का यत्न किए बिना उसको धर्म-शिक्षा देना सर्वथा व्यर्थ है। इसी कारण भारत के दरिद्रजनों की मुक्ति का साधन जुटाने मैं अब अमेरिका जा रहा हूं।’’

31 मई, 1893 को वे बम्बई से अमेरिका के लिए जहाज़ पर सवार हुए। उस समय उन्होंने रेशमी अंगरखा पहन रखा था और सिर पर गेरूए रंग की पगड़ी थी।


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