विदेश यात्रा
‘‘विस्तार जीवन है और संकोच मृत्यु।’’
-विवेकानन्द
भारत-भ्रमण के दौरान विवेकानन्द के पास संन्यासी होने के नाते दंड कमंडलु तथा चन्द पुस्तकें रहती थी, पर अब ट्रंक, सूटकेस, बिस्तर, कपड़े आदि काफी सामान था, जिसे सम्भालने मंे काफी परेशानी उठानी पड़ रही थी। अपने स्वभाव के अनुसार जहाज़ के यात्रियों से वे शीघ्र हिल-मिल गए और जहाज़ पर बनने वाले कई प्रकार के भोजन के भी वह धीरे-धीरे आदि हो गए। मद्रास के अपने शिष्य
विदेश यात्रा
‘‘विस्तार जीवन है और संकोच मृत्यु।’’
-विवेकानन्द
भारत-भ्रमण के दौरान विवेकानन्द के पास संन्यासी होने के नाते दंड कमंडलु तथा चन्द पुस्तकें रहती थी, पर अब ट्रंक, सूटकेस, बिस्तर, कपड़े आदि काफी सामान था, जिसे सम्भालने मंे काफी परेशानी उठानी पड़ रही थी। अपने स्वभाव के अनुसार जहाज़ के यात्रियों से वे शीघ्र हिल-मिल गए और जहाज़ पर बनने वाले कई प्रकार के भोजन के भी वह धीरे-धीरे आदि हो गए। मद्रास के अपने शिष्य