योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

आलासिंगा पेरूमल को लिखे पत्रों में इस यात्रा का वर्णन उन्होंने विस्तार से किया है। बेहतर होगा कि हम उसे उन्हीं के शब्दों में उद्वत कर दें। 10 जुलाई, 1893 को याकोहामा (जापान) से लिखा है:

‘‘अपनी गतिविधि की सूचना तुम लोगों को बराबर न देते रहने के लिए क्षमा-प्रार्थी हूं। यात्रा में जीवन बहुत व्यस्त रहता है, और विशेषतः बहुत-सा सामान-असबाब अपने साथ रखना और उसकी देखभाल करना तो मेरे लिए एक नई बात है। इसी में मेरी काफी शक्ति लग रही है।’’


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आलासिंगा पेरूमल को लिखे पत्रों में इस यात्रा का वर्णन उन्होंने विस्तार से किया है। बेहतर होगा कि हम उसे उन्हीं के शब्दों में उद्वत कर दें। 10 जुलाई, 1893 को याकोहामा (जापान) से लिखा है:

‘‘अपनी गतिविधि की सूचना तुम लोगों को बराबर न देते रहने के लिए क्षमा-प्रार्थी हूं। यात्रा में जीवन बहुत व्यस्त रहता है, और विशेषतः बहुत-सा सामान-असबाब अपने साथ रखना और उसकी देखभाल करना तो मेरे लिए एक नई बात है। इसी में मेरी काफी शक्ति लग रही है।’’


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