योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

कभी भारी बोझ ढकेलती हैं, या कभी बड़ी फुर्ती से एक डोंगी से दूसरी डोंगी में कूद जाती है। और यह सब होता है, लगातार इधर से उधर जाने वाली डोंगियों और वाष्प नौकाओं की भीड़ के बीच। हर समय उन चीनी बाल-गोपालांे के शिखायुक्त मस्तिष्कों के चूर-चूर हो जाने का डर रहता है। पर उन्हें इसकी क्या परवाह? उन्हें इन बाहर की हलचलों से कोई सरोकार नहीं, वे तो अपनी चावल की रोटी कुतर-कुतरकर खाने में मस्त रहते हैं, जो काम के झंझटों में बौखलाई हुई


346 of 1197

कभी भारी बोझ ढकेलती हैं, या कभी बड़ी फुर्ती से एक डोंगी से दूसरी डोंगी में कूद जाती है। और यह सब होता है, लगातार इधर से उधर जाने वाली डोंगियों और वाष्प नौकाओं की भीड़ के बीच। हर समय उन चीनी बाल-गोपालांे के शिखायुक्त मस्तिष्कों के चूर-चूर हो जाने का डर रहता है। पर उन्हें इसकी क्या परवाह? उन्हें इन बाहर की हलचलों से कोई सरोकार नहीं, वे तो अपनी चावल की रोटी कुतर-कुतरकर खाने में मस्त रहते हैं, जो काम के झंझटों में बौखलाई हुई


346 of 1197