मां उन्हें देती है। चीनी बच्चों को पूरा दार्शनिक ही समझो। जिस उम्र में भारतीय बच्चें घुटनों के बल भी नहीं चल पाते, उस उम्र में वह स्थिर भाव से काम पर जाता है। आवश्यकता का दर्शन वह अच्छी तरह सीख और समझ लेता है। चीनियों और भारतीयों की नितान्त दरिद्रता ही ने उनकी सभ्यताओं को निर्जीव बना रखा है। साधारण हिन्दू या चीनी के लिए उसकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति इतनी भयंकर लगती है कि उसे और कुछ सोचने की फुरसत नहीं।’’
सोचिए, विवेकानन्द
मां उन्हें देती है। चीनी बच्चों को पूरा दार्शनिक ही समझो। जिस उम्र में भारतीय बच्चें घुटनों के बल भी नहीं चल पाते, उस उम्र में वह स्थिर भाव से काम पर जाता है। आवश्यकता का दर्शन वह अच्छी तरह सीख और समझ लेता है। चीनियों और भारतीयों की नितान्त दरिद्रता ही ने उनकी सभ्यताओं को निर्जीव बना रखा है। साधारण हिन्दू या चीनी के लिए उसकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति इतनी भयंकर लगती है कि उसे और कुछ सोचने की फुरसत नहीं।’’
सोचिए, विवेकानन्द