क्या दिल और दिमाग लेकर यात्रा पर निकले थे! यह पैनी और सूक्ष्म दृष्टि, यह विशाल, विराट हृदय, यह सौंदर्य पे्रम, यह श्रम के प्रति आदर और यथार्थ विश्लेषण! उनके यात्रा-वर्णन पढ़ते हुए सबुद्व पाठक को ऐसा लगता है, जैसे वह चेतना के महासागर में तैर रहा हो।
हांगकांग से स्वामी जी केंटन गए, जो वहां से अस्सी मील हैं लिखा है, ‘‘जिस छोटे-से-भू-भाग पर हम लोग उतरे, वह चीन सरकार की ओर से विदेशियों के रहने
76 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
क्या दिल और दिमाग लेकर यात्रा पर निकले थे! यह पैनी और सूक्ष्म दृष्टि, यह विशाल, विराट हृदय, यह सौंदर्य पे्रम, यह श्रम के प्रति आदर और यथार्थ विश्लेषण! उनके यात्रा-वर्णन पढ़ते हुए सबुद्व पाठक को ऐसा लगता है, जैसे वह चेतना के महासागर में तैर रहा हो।
हांगकांग से स्वामी जी केंटन गए, जो वहां से अस्सी मील हैं लिखा है, ‘‘जिस छोटे-से-भू-भाग पर हम लोग उतरे, वह चीन सरकार की ओर से विदेशियों के रहने
76 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द