योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

इतने ही खर्च करता है। अब मुझे असम्भव अवस्थाओं से संघर्ष करना पड़ता है। सैंकड़ों बार इच्छा हुई कि मै। इस देश से चल दूं और भारत लौट आऊं।’’

स्ुनहरे स्वप्न टूटने का कारण यह था कि अमेरिका पर 1890 से आर्थिक संकट के बाद मंडरा रहे थे और अब 1893 मंे यह बहुत गहरा गया था। इसी एक बरस में 15,000 फर्माें, बैंकों और छोटे कारखानों का दिवाला पिटा। हज़ारों मज़दूर बेकार हो गए और जो काम पर थे उनकी मज़दूरी घटा दी गई। विवेकानन्द जिस अमेरिका से भारत के दरिद्रों के लिए धन जुटाने गए थे,


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इतने ही खर्च करता है। अब मुझे असम्भव अवस्थाओं से संघर्ष करना पड़ता है। सैंकड़ों बार इच्छा हुई कि मै। इस देश से चल दूं और भारत लौट आऊं।’’

स्ुनहरे स्वप्न टूटने का कारण यह था कि अमेरिका पर 1890 से आर्थिक संकट के बाद मंडरा रहे थे और अब 1893 मंे यह बहुत गहरा गया था। इसी एक बरस में 15,000 फर्माें, बैंकों और छोटे कारखानों का दिवाला पिटा। हज़ारों मज़दूर बेकार हो गए और जो काम पर थे उनकी मज़दूरी घटा दी गई। विवेकानन्द जिस अमेरिका से भारत के दरिद्रों के लिए धन जुटाने गए थे,


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