योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

रूचि नहीं थी। धर्मानुरागी युवक दुर्गाचरण सत्संग और शास्त्र-चर्चा के अवसर और सुयोग खोजते रहते थे। परिणाम यह कि जब उनकी अवस्था सिर्फ पच्चीस बरस थी तो उत्तर-पश्चिम प्रदेशों से आए वेदान्ती साधुओं से वे इतने प्रभावित हुए कि घर-बार छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। पतिवियोग में तड़पती हुई जवान पत्नी के लिए गोद का नन्हा बालक ही एकमात्र सहारा रह गया। संन्यासी प्रथा के अनुसार बारह बरस बाद जब दुर्गाचरण अपनी जन्मभूमि का दर्शन करने आए


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रूचि नहीं थी। धर्मानुरागी युवक दुर्गाचरण सत्संग और शास्त्र-चर्चा के अवसर और सुयोग खोजते रहते थे। परिणाम यह कि जब उनकी अवस्था सिर्फ पच्चीस बरस थी तो उत्तर-पश्चिम प्रदेशों से आए वेदान्ती साधुओं से वे इतने प्रभावित हुए कि घर-बार छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। पतिवियोग में तड़पती हुई जवान पत्नी के लिए गोद का नन्हा बालक ही एकमात्र सहारा रह गया। संन्यासी प्रथा के अनुसार बारह बरस बाद जब दुर्गाचरण अपनी जन्मभूमि का दर्शन करने आए


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