शिकागो महासभा के अध्यक्ष अपने मित्र डा. बरोज के नाम उसी समय एक पत्र लिखा। यह पत्र लेकर स्वामी जी फिर शिकागो की ओर चले। रेल का टिकट प्रोफेसर महोदय ने अपनी जेब से खरीद कर दिया।
विवेकानन्द खुशी-खुशी शिकागो लौटे। गाड़ी देर से पहुंची थी और उनके पास धर्म-महासभा के दफ्तर का जो पता था, वह कहीं रास्ते ही में खो गया था। अब इतने बड़े शहर में वे शहर में वे दफ्तर का पता कैसे लगाएं? राह चलते दो-चार आदमियों से पूछा तो उन्होंने स्वामी
शिकागो महासभा के अध्यक्ष अपने मित्र डा. बरोज के नाम उसी समय एक पत्र लिखा। यह पत्र लेकर स्वामी जी फिर शिकागो की ओर चले। रेल का टिकट प्रोफेसर महोदय ने अपनी जेब से खरीद कर दिया।
विवेकानन्द खुशी-खुशी शिकागो लौटे। गाड़ी देर से पहुंची थी और उनके पास धर्म-महासभा के दफ्तर का जो पता था, वह कहीं रास्ते ही में खो गया था। अब इतने बड़े शहर में वे शहर में वे दफ्तर का पता कैसे लगाएं? राह चलते दो-चार आदमियों से पूछा तो उन्होंने स्वामी