योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पर्यटक नहीं थे। वे तो भारत की दरिद्रता का उपाय ढूंढ़ने अमेरिका आए थे। इसलिए देश को और देश की निर्धन जनता को उन्होंने कभी एक क्षण के लिए भी नहीं बुलाया। अमेरिका की यह उन्नति तथा समृद्वि देखकर दरिद्र तथा विपन्न भारत का चित्र भी उनकी दृष्टि में खिंच आता था। देखिए, तब उनका दिल कैसे खून के आंसू रोता था:

‘‘जिस देश में करोड़ों मनुष्य महुआ खाकर दिन गुज़ारते हैं, और दस-बीस लाख साधु और दस-बारह करोड़ ब्राह्यण उन गरीबोें का खून चूसकर


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पर्यटक नहीं थे। वे तो भारत की दरिद्रता का उपाय ढूंढ़ने अमेरिका आए थे। इसलिए देश को और देश की निर्धन जनता को उन्होंने कभी एक क्षण के लिए भी नहीं बुलाया। अमेरिका की यह उन्नति तथा समृद्वि देखकर दरिद्र तथा विपन्न भारत का चित्र भी उनकी दृष्टि में खिंच आता था। देखिए, तब उनका दिल कैसे खून के आंसू रोता था:

‘‘जिस देश में करोड़ों मनुष्य महुआ खाकर दिन गुज़ारते हैं, और दस-बीस लाख साधु और दस-बारह करोड़ ब्राह्यण उन गरीबोें का खून चूसकर


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