हम देख चुके हैं कि भारत भ्रमण के बाद अपनी इस योजना के लिए जब महाजनों तथा राजे-महाराजाओं से धन पाने की कोई आशा न रही, तब वे अमेरिका आए थे। सरल-हृदय स्वामी को यहां भी वही निराशा हाथ लगी और इसे उन्होंने यों व्यक्त किया, ‘‘इस देश में पूरे सालभर तक व्याख्यान देने पर भी मैं अपने कार्य के आरम्भ के लिए धर्नाजन की अपनी इस योजना में ज़रा भी सफल नहीं हो सका।’’
जिस प्रकार बिल्ली की नर्म-नर्म खाल के नीचे तीखे पंजे छिपे रहते हैं,
हम देख चुके हैं कि भारत भ्रमण के बाद अपनी इस योजना के लिए जब महाजनों तथा राजे-महाराजाओं से धन पाने की कोई आशा न रही, तब वे अमेरिका आए थे। सरल-हृदय स्वामी को यहां भी वही निराशा हाथ लगी और इसे उन्होंने यों व्यक्त किया, ‘‘इस देश में पूरे सालभर तक व्याख्यान देने पर भी मैं अपने कार्य के आरम्भ के लिए धर्नाजन की अपनी इस योजना में ज़रा भी सफल नहीं हो सका।’’
जिस प्रकार बिल्ली की नर्म-नर्म खाल के नीचे तीखे पंजे छिपे रहते हैं,