दे रही थी। चिंतन के क्षितिज पर यह भय स्पष्ट मंडरा रहा था कि कहीं प्राच्य पाश्चात्य से पराजित न हो जाए। ब्रह्मसमाज, जो वास्तव में इस संघर्ष का संगठित रूप था, अब इस भय के कारण आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज-दो में विभाजित हो गया था। इन दोनों के आपसी संघर्ष का परिणाम यह था कि आदि ब्रह्मसमाज वाले प्राचीनता के खोल में सिकुड़ते जा रहे थे और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज वाले परम्परा से संबंध-विच्छेद करके आधुनिकता के नशे में
दे रही थी। चिंतन के क्षितिज पर यह भय स्पष्ट मंडरा रहा था कि कहीं प्राच्य पाश्चात्य से पराजित न हो जाए। ब्रह्मसमाज, जो वास्तव में इस संघर्ष का संगठित रूप था, अब इस भय के कारण आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज-दो में विभाजित हो गया था। इन दोनों के आपसी संघर्ष का परिणाम यह था कि आदि ब्रह्मसमाज वाले प्राचीनता के खोल में सिकुड़ते जा रहे थे और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज वाले परम्परा से संबंध-विच्छेद करके आधुनिकता के नशे में