लड़खड़ाते पाश्चात्य की ओर झुक रहे थे। पढ़े-लिखे बंगाली युवक अपने स्वभाव और संस्कार के अनुसार इन दोनों में से किसी एक को चुनते थे। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी दिन-दिन बढ़ती जा रही थी, जिनका न आदि ब्रह्मसमाज से कोई सरोकार था और न अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज से। और अगर था तो वह भी अत्यन्त औपचारिक और ऊपरी । उन्हें न प्राचीनता से कुछ लेना-देना था और न अपने को आधुनिक दिखाने की विशेष चिन्ता थी। व्यक्तिगत सुख-साधन उनके जीवन का एकमात्र
लड़खड़ाते पाश्चात्य की ओर झुक रहे थे। पढ़े-लिखे बंगाली युवक अपने स्वभाव और संस्कार के अनुसार इन दोनों में से किसी एक को चुनते थे। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी दिन-दिन बढ़ती जा रही थी, जिनका न आदि ब्रह्मसमाज से कोई सरोकार था और न अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज से। और अगर था तो वह भी अत्यन्त औपचारिक और ऊपरी । उन्हें न प्राचीनता से कुछ लेना-देना था और न अपने को आधुनिक दिखाने की विशेष चिन्ता थी। व्यक्तिगत सुख-साधन उनके जीवन का एकमात्र