योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

रहा है। मैं इस यंत्र के केन्द्र स्थल में अपने विचार रख देना चाहता हूं, और वे सारी दुनिया में फेल जाएंगे।’’

लगातार काम करते हुए अब वे बहुत थक गए थे, इसलिए स्विटज़रलैंड में दो महीने विश्राम किया। वहां से गुडविन को लिखा, ‘‘मुझे अब बहुत ताज़गी मालूम होती है। मैं खिड़की से बाहर दृष्टि डालता हूं, मुझे बड़ी-बड़ी नदियां दिखती हैं और मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं हिमालय में हूं। मैं बिलकुल शान्त हूं। मेरे स्नायुओं ने अपनी पूरानी शक्ति पुनः प्राप्त कर ली है।’’1


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रहा है। मैं इस यंत्र के केन्द्र स्थल में अपने विचार रख देना चाहता हूं, और वे सारी दुनिया में फेल जाएंगे।’’

लगातार काम करते हुए अब वे बहुत थक गए थे, इसलिए स्विटज़रलैंड में दो महीने विश्राम किया। वहां से गुडविन को लिखा, ‘‘मुझे अब बहुत ताज़गी मालूम होती है। मैं खिड़की से बाहर दृष्टि डालता हूं, मुझे बड़ी-बड़ी नदियां दिखती हैं और मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं हिमालय में हूं। मैं बिलकुल शान्त हूं। मेरे स्नायुओं ने अपनी पूरानी शक्ति पुनः प्राप्त कर ली है।’’1


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