88 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
पढ़ी होगी। नहीं यह कैसे सम्भव है कि दो सौ पृष्ठ की पुस्तक आध घंटे में याद हो जाए!’’
स्वामी जी ने हंसते हुए उत्तर दिया, ‘‘मैंने यह पुस्तक यहां देखी है। मैं चूंकि पूरे मनोयोग से पढ़ता हूं, इसलिए हर एक पुस्तक मुझे इसी तरह याद हो जाती है।’’
कहावत है कि ‘‘विद्या कंठ की और पैसा गांठ का।’’ संन्यासी होने के कारण विवेकानन्द पैसे तो अपने पास नहीं रखते थे, लेकिन जो कुछ पढ़ते थे वे उन्हें कंठ हो
88 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
पढ़ी होगी। नहीं यह कैसे सम्भव है कि दो सौ पृष्ठ की पुस्तक आध घंटे में याद हो जाए!’’
स्वामी जी ने हंसते हुए उत्तर दिया, ‘‘मैंने यह पुस्तक यहां देखी है। मैं चूंकि पूरे मनोयोग से पढ़ता हूं, इसलिए हर एक पुस्तक मुझे इसी तरह याद हो जाती है।’’
कहावत है कि ‘‘विद्या कंठ की और पैसा गांठ का।’’ संन्यासी होने के कारण विवेकानन्द पैसे तो अपने पास नहीं रखते थे, लेकिन जो कुछ पढ़ते थे वे उन्हें कंठ हो