धड़ल्ले से कमाना और अधिकाधिक सुख-सुविधांए जुटाना। घर पर अतिथियों तथा सगे-संबंधियों की भीड़ लगी रहती थी। ज़रूरत से ज्यादा नौकर-चाकर और
16 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
गाड़ी-घोड़े रखकर ठाठ-बाट से जीना, उनका स्वभाव बन चुका था। वे खुले हाथ से खर्च करते और खुले हाथ से दान भी देते थे। बचाकर रखने की, भविष्य अथवा परलोक की चिंता उन्हें नहीं थी। एक वाक्य में यों कह लीजिए कि वे भोग और त्याग का ‘आधुनिक समिश्रण’ थे-उदार, स्वच्छंद और मिलनसार!
धड़ल्ले से कमाना और अधिकाधिक सुख-सुविधांए जुटाना। घर पर अतिथियों तथा सगे-संबंधियों की भीड़ लगी रहती थी। ज़रूरत से ज्यादा नौकर-चाकर और
16 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
गाड़ी-घोड़े रखकर ठाठ-बाट से जीना, उनका स्वभाव बन चुका था। वे खुले हाथ से खर्च करते और खुले हाथ से दान भी देते थे। बचाकर रखने की, भविष्य अथवा परलोक की चिंता उन्हें नहीं थी। एक वाक्य में यों कह लीजिए कि वे भोग और त्याग का ‘आधुनिक समिश्रण’ थे-उदार, स्वच्छंद और मिलनसार!