उसमें उन्होंने जहां वेदान्त दर्शन की तात्िवक व्याख्या की वहां वे ईसाई धर्म क मूलाधार पर प्रहार करने से नहीं चूके। ईसाई धर्म का मूलाधार है ‘पाप बोध’। उसकी मान्यता है कि आदमी ने वर्जित फल खाने का जो पाप किया, उसके फलस्वरूप उसे हव्वा समेत स्वर्ग से धरती पर आना पड़ा। और इसी से सृष्टि का आरम्भ हुआ। इसलिए पाप मनुष्य का सहज स्वभाव है। वह जब तक जिएगा पाप करेगा। पाप का प्रायश्चित करने के लिए ही उसे ईसा को मध्यस्थ बनाने तथा गिरजा
उसमें उन्होंने जहां वेदान्त दर्शन की तात्िवक व्याख्या की वहां वे ईसाई धर्म क मूलाधार पर प्रहार करने से नहीं चूके। ईसाई धर्म का मूलाधार है ‘पाप बोध’। उसकी मान्यता है कि आदमी ने वर्जित फल खाने का जो पाप किया, उसके फलस्वरूप उसे हव्वा समेत स्वर्ग से धरती पर आना पड़ा। और इसी से सृष्टि का आरम्भ हुआ। इसलिए पाप मनुष्य का सहज स्वभाव है। वह जब तक जिएगा पाप करेगा। पाप का प्रायश्चित करने के लिए ही उसे ईसा को मध्यस्थ बनाने तथा गिरजा