जाने की जरूरत है। स्वामी जी ने ‘अमृत के पुत्रों’ के मधुर सम्बोधन के प्रयोग की आज्ञा मांगते हुए कहा:
‘‘निश्चय ही हिन्दू आपको पापी कहना अस्वीकार करता है। आप तो ईश्वर की सन्तान है, अमर आनन्द के भागी हैं, पवित्र और पूर्ण आत्मा है। आप इस मत्र्यीाूमि पर देवता हैं। आप भला पापी? मनुष्य को पापी कहना ही पाप है, वह मानव स्वरूप् पर घोर लांछन है। आप उठें। हे सिंहों! टाएं और इस मिथ्या धारणा को झटककर दूर फेंक दें कि आप भेड़ हैं। आप हैं आत्मा,
जाने की जरूरत है। स्वामी जी ने ‘अमृत के पुत्रों’ के मधुर सम्बोधन के प्रयोग की आज्ञा मांगते हुए कहा:
‘‘निश्चय ही हिन्दू आपको पापी कहना अस्वीकार करता है। आप तो ईश्वर की सन्तान है, अमर आनन्द के भागी हैं, पवित्र और पूर्ण आत्मा है। आप इस मत्र्यीाूमि पर देवता हैं। आप भला पापी? मनुष्य को पापी कहना ही पाप है, वह मानव स्वरूप् पर घोर लांछन है। आप उठें। हे सिंहों! टाएं और इस मिथ्या धारणा को झटककर दूर फेंक दें कि आप भेड़ हैं। आप हैं आत्मा,