वे हाथ उठाएं।’’ तो प्रायः सात हज़ार व्यक्तियों में से सिर्फ तीन-चार हाथ उठे। योद्धा संन्यासी विवेकानन्द मस्तक ऊंचा करके विद्रूपभाव से मुस्कराते हुए बोले, ‘‘फिर बताइए, आप किस बिरते पर हमारे धर्म की आलोचना करेंगे?’’ (विवेकानन्द चरित पृष्ठ 232.33)
विवेकानन्द धर्म-महासभा में भारत की निर्धन तथा उत्पीड़ित जनता के प्रतिनिधि थे-उस जनता के जिसे पादरी लोग तरह-तरह के लोभ लालच-दिखाकर ईसाई बनाने का प्रयत्न करते थे। 20 सितम्बर के ढाई
वे हाथ उठाएं।’’ तो प्रायः सात हज़ार व्यक्तियों में से सिर्फ तीन-चार हाथ उठे। योद्धा संन्यासी विवेकानन्द मस्तक ऊंचा करके विद्रूपभाव से मुस्कराते हुए बोले, ‘‘फिर बताइए, आप किस बिरते पर हमारे धर्म की आलोचना करेंगे?’’ (विवेकानन्द चरित पृष्ठ 232.33)
विवेकानन्द धर्म-महासभा में भारत की निर्धन तथा उत्पीड़ित जनता के प्रतिनिधि थे-उस जनता के जिसे पादरी लोग तरह-तरह के लोभ लालच-दिखाकर ईसाई बनाने का प्रयत्न करते थे। 20 सितम्बर के ढाई