अथवा वायु या जल बन जाता है? नहीं, वह तो वृद्व ही रहता है, वह अपनी वृद्वि के नियम ही से बढ़ता है-वायु, जल और मिट्टी को अपने में पचाकर, उनको उद्भिज पदार्थ में परिवर्तित करके एक वृक्ष हो जाता है।
ऐसा ही धर्म के संबंध में भी है। ईसाई को हिन्दू या बौद्व या बौद्व नहीं हो जाना चाहिए और न हिन्दू अथवा बौद्व को ईसाई ही। पर हां, प्रत्येक को चाहिए कि वह दूसरों के सार-भाग को आत्मसात् करके पुष्टि-लाभ करे और अपने वैषिष्ट्य की रक्षा
अथवा वायु या जल बन जाता है? नहीं, वह तो वृद्व ही रहता है, वह अपनी वृद्वि के नियम ही से बढ़ता है-वायु, जल और मिट्टी को अपने में पचाकर, उनको उद्भिज पदार्थ में परिवर्तित करके एक वृक्ष हो जाता है।
ऐसा ही धर्म के संबंध में भी है। ईसाई को हिन्दू या बौद्व या बौद्व नहीं हो जाना चाहिए और न हिन्दू अथवा बौद्व को ईसाई ही। पर हां, प्रत्येक को चाहिए कि वह दूसरों के सार-भाग को आत्मसात् करके पुष्टि-लाभ करे और अपने वैषिष्ट्य की रक्षा