करते हुए अपनी निजी बुद्वि का नियम के अनुसार वृद्वि को प्राप्त हो।’’ (प्रथम खंड)।
98 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
प्रबुद्व श्रोताओं ने विवेकानन्द को धर्म-सभा का सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। अखबारों में उनके भाषण पूरे-पूरे प्रकाशित हुए और उन पर प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखी गई। कोई एक साल बाद अर्थात् 15 नवम्बर, 1894 को उन्होंने अपने एक पत्र में हरिदास देसाई को लिखा:
‘‘मैं धर्म-महासभा में बोला था, और उसका क्या परिणाम हुआ, यह
करते हुए अपनी निजी बुद्वि का नियम के अनुसार वृद्वि को प्राप्त हो।’’ (प्रथम खंड)।
98 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
प्रबुद्व श्रोताओं ने विवेकानन्द को धर्म-सभा का सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। अखबारों में उनके भाषण पूरे-पूरे प्रकाशित हुए और उन पर प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखी गई। कोई एक साल बाद अर्थात् 15 नवम्बर, 1894 को उन्होंने अपने एक पत्र में हरिदास देसाई को लिखा:
‘‘मैं धर्म-महासभा में बोला था, और उसका क्या परिणाम हुआ, यह