हो गई कि वह एक दिन बाज़ार से उन दोनों की मूर्ति खरीद लाया। मकान की छत पर एक सूने कमरे में उसने यह मूर्ति स्थापित कर दी और वह उसके सामने घंटों ध्यान-मग्न बैठा रहता। अपने एक कोचबान से नरेन्द्र बहत हिल-मिल गया था। बालक को सीताराम से यह प्रेम देखकर वह कोचवान बहुत प्रसन्न होता। नरेन्द्र के मन में कोई समस्या, कोई प्रश्न उठता तो कोचवान मित्र ही उसका उत्तर दिया करता था। एक दिन अचानक ब्याह पर चर्चा चली। कोचवान को जाने क्यों ब्याह
हो गई कि वह एक दिन बाज़ार से उन दोनों की मूर्ति खरीद लाया। मकान की छत पर एक सूने कमरे में उसने यह मूर्ति स्थापित कर दी और वह उसके सामने घंटों ध्यान-मग्न बैठा रहता। अपने एक कोचबान से नरेन्द्र बहत हिल-मिल गया था। बालक को सीताराम से यह प्रेम देखकर वह कोचवान बहुत प्रसन्न होता। नरेन्द्र के मन में कोई समस्या, कोई प्रश्न उठता तो कोचवान मित्र ही उसका उत्तर दिया करता था। एक दिन अचानक ब्याह पर चर्चा चली। कोचवान को जाने क्यों ब्याह