योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

फिर उनका धैर्य चुक गया। उन्होंने कोई भय नहीं दिखाया। वे हिंसा, लूट और विनाश के तत्वों से पूर्ण पश्चिमी सभ्यता के पापों और अपराधों की भत्र्सना करने लगे। एक बार

100 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

उन्हें बोस्टन में अपने अत्यन्त प्रिय धार्मिक विषय पर बोलना था, चलते-पुर्जे दुनियापुर महाशयों का खोखला और बर्बर श्रोता-समाज सामने देखकर उन्हें इतनी वितृष्णा हुई कि अपनी आत्मा का सहस्य उन्हें देने से इन्कार करके हठात् उन्होंने विषयान्तर कर दिया,


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फिर उनका धैर्य चुक गया। उन्होंने कोई भय नहीं दिखाया। वे हिंसा, लूट और विनाश के तत्वों से पूर्ण पश्चिमी सभ्यता के पापों और अपराधों की भत्र्सना करने लगे। एक बार

100 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

उन्हें बोस्टन में अपने अत्यन्त प्रिय धार्मिक विषय पर बोलना था, चलते-पुर्जे दुनियापुर महाशयों का खोखला और बर्बर श्रोता-समाज सामने देखकर उन्हें इतनी वितृष्णा हुई कि अपनी आत्मा का सहस्य उन्हें देने से इन्कार करके हठात् उन्होंने विषयान्तर कर दिया,


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