गुरू-भाइयों को वास्तविकता स्थिति मालूम नहीं थी, वे इस प्रकार से बड़े सटपटाए। उन्होंने स्वामी जी को इस बारे मंे लिखा और उनके खिलाफ लिखने वाले अखबारों की कतरनें भेजी। 24 जनवरी, 1894 को उन्होंने अपने मद्रास के शिष्यों को लिखाः
‘‘मुझे तुम्हारे पत्र मिले। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मेरे संबंध में इतनी अधिक बातें तुम लोगों ने जो उल्लेख किया है, उसे अमेरिकी जनता का रूख समझ बैठना। इस पत्रिका के विषय में यहां के लोगों को प्रायः
गुरू-भाइयों को वास्तविकता स्थिति मालूम नहीं थी, वे इस प्रकार से बड़े सटपटाए। उन्होंने स्वामी जी को इस बारे मंे लिखा और उनके खिलाफ लिखने वाले अखबारों की कतरनें भेजी। 24 जनवरी, 1894 को उन्होंने अपने मद्रास के शिष्यों को लिखाः
‘‘मुझे तुम्हारे पत्र मिले। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मेरे संबंध में इतनी अधिक बातें तुम लोगों ने जो उल्लेख किया है, उसे अमेरिकी जनता का रूख समझ बैठना। इस पत्रिका के विषय में यहां के लोगों को प्रायः