से क्या लाभ? लेकिन विरोध का तूफान दिन-दिन ऊंचा उठता चला गया। ईसाई मिशनरी, हिन्दू कट्टरपंथी, थियोसाॅफिस्ट, सुधारवादी, ब्रह्मसमाजी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक तत्व इस विरोध में एक ही मंच पर इकट्ठे हो गए। अब विवेकानन्द भी एकदेशीय बुद्वि के व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने बखूबी समझ लिया कि अब उपेक्षा मात्र से काम नहीं चलेगा, समय आ गया है कि मिथ्या प्रचार का उत्तर दिया जाए और इस विरोध को अपने उद्देश्य के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयोग
से क्या लाभ? लेकिन विरोध का तूफान दिन-दिन ऊंचा उठता चला गया। ईसाई मिशनरी, हिन्दू कट्टरपंथी, थियोसाॅफिस्ट, सुधारवादी, ब्रह्मसमाजी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक तत्व इस विरोध में एक ही मंच पर इकट्ठे हो गए। अब विवेकानन्द भी एकदेशीय बुद्वि के व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने बखूबी समझ लिया कि अब उपेक्षा मात्र से काम नहीं चलेगा, समय आ गया है कि मिथ्या प्रचार का उत्तर दिया जाए और इस विरोध को अपने उद्देश्य के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयोग