जो उसने इतने चाव और श्रद्वा से खरीदी थी, कमरे से उठा लाया। मुंडेर पर आकर उसने मूर्ति बिना संकोच नीचे फेंक दी, जो गिरते ही चूर-चूर हो गई।
नरेन्द्र बड़ा नटखट था। उसके ऊधम के मारे सबकी नाक में दम था। बड़ी बहनें उसके पीछे दौड़ती कि पकड़कर पीटें। नरेन्द्र चट से नाली में उतरकर बदन पर कीचड़ लगा लेता। बहनें अपवित्र होने के डर से उसे छू न पाती। वह विजय-गर्व
17 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
से ताली बजाकर कहता, ‘‘लो, पकड़ो न मुझे!’’
जो उसने इतने चाव और श्रद्वा से खरीदी थी, कमरे से उठा लाया। मुंडेर पर आकर उसने मूर्ति बिना संकोच नीचे फेंक दी, जो गिरते ही चूर-चूर हो गई।
नरेन्द्र बड़ा नटखट था। उसके ऊधम के मारे सबकी नाक में दम था। बड़ी बहनें उसके पीछे दौड़ती कि पकड़कर पीटें। नरेन्द्र चट से नाली में उतरकर बदन पर कीचड़ लगा लेता। बहनें अपवित्र होने के डर से उसे छू न पाती। वह विजय-गर्व
17 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
से ताली बजाकर कहता, ‘‘लो, पकड़ो न मुझे!’’