आत्मा को झंझोरना-जगाना भी था। अतएव अभिनन्दन के उत्तर में कलकत्ता की सभा के सभापति प्यारी मोहन मुखर्जी को विवेकानन्छ ने 18 नवम्बर, 1894 के पत्र में लिखा:
‘‘लेन-देन ही संसार का नियम है और यदि भारत फिर से उठना चाहे तो यह परमावश्यक है कि वह अपने रत्नों को बाहर लाकर पृथ्वी की जातियों में बिखेर दे और इसके बदले में वे जो कुछ दे सकें, उसे सहर्ष ग्रहण करे। विस्तार ही जीवन है और संकोच मृत्यु, पे्रम ही जीवन है और द्वेष मृत्यु। हमने उसी दिन से मरना शुरू कर दिया,
आत्मा को झंझोरना-जगाना भी था। अतएव अभिनन्दन के उत्तर में कलकत्ता की सभा के सभापति प्यारी मोहन मुखर्जी को विवेकानन्छ ने 18 नवम्बर, 1894 के पत्र में लिखा:
‘‘लेन-देन ही संसार का नियम है और यदि भारत फिर से उठना चाहे तो यह परमावश्यक है कि वह अपने रत्नों को बाहर लाकर पृथ्वी की जातियों में बिखेर दे और इसके बदले में वे जो कुछ दे सकें, उसे सहर्ष ग्रहण करे। विस्तार ही जीवन है और संकोच मृत्यु, पे्रम ही जीवन है और द्वेष मृत्यु। हमने उसी दिन से मरना शुरू कर दिया,