योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

जब से हम अन्य जातियों से घृणा करने लगे, और यह मृत्यु बिना इसके किसी दूसरे उपाय से रूक नहीं सकती कि हम फिर से विस्तार को अपनाएं, जो जीवन का चिहृ हैं।

‘‘अतएव हमें पृथ्वी की सभी जातियों से मिलना पड़ेगा और प्रत्येक हिन्दू, जो विदेश-भ्रमण करने जाता है, उन सैकड़ों मनुष्यों से अपने देश को अधिक लाभ पहुंचाता है, जो केवल अन्धविश्वासों एवं स्वार्थपरताओं की गठरी मात्र हैं, और जिनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य‘न खुद खाए, न दूसरों को खाने दे’ कहावत के अनुसार न अपना हित करना है,


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जब से हम अन्य जातियों से घृणा करने लगे, और यह मृत्यु बिना इसके किसी दूसरे उपाय से रूक नहीं सकती कि हम फिर से विस्तार को अपनाएं, जो जीवन का चिहृ हैं।

‘‘अतएव हमें पृथ्वी की सभी जातियों से मिलना पड़ेगा और प्रत्येक हिन्दू, जो विदेश-भ्रमण करने जाता है, उन सैकड़ों मनुष्यों से अपने देश को अधिक लाभ पहुंचाता है, जो केवल अन्धविश्वासों एवं स्वार्थपरताओं की गठरी मात्र हैं, और जिनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य‘न खुद खाए, न दूसरों को खाने दे’ कहावत के अनुसार न अपना हित करना है,


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