न पराए का। पाश्चात्य राष्ट्रों ने राष्ट्रीय जीवन के जो आश्चर्यजनक प्रासाद बनाए हैं, वे चरित्ररूपी सुदृढ़ स्तंभों पर खड़े हैं और जब तक हम अधिक से अधिक संख्या में वैसे चरित्र न गढ़ लें, तब तक हमारे लिए किसी शक्ति विशेष के विरूद्व अपना विशेष असंतोष व्यक्त करते रहना निरर्थक है।’’
‘‘क्या वे लोग स्वाधीनता पाने योग्य हैं, जो दूसरों को स्वाधीनता देने के लिए प्रस्तुत नहीं? व्यर्थ का असंतोष जताते हुए शक्तिक्षय करने के बदले हम चुपचाप
न पराए का। पाश्चात्य राष्ट्रों ने राष्ट्रीय जीवन के जो आश्चर्यजनक प्रासाद बनाए हैं, वे चरित्ररूपी सुदृढ़ स्तंभों पर खड़े हैं और जब तक हम अधिक से अधिक संख्या में वैसे चरित्र न गढ़ लें, तब तक हमारे लिए किसी शक्ति विशेष के विरूद्व अपना विशेष असंतोष व्यक्त करते रहना निरर्थक है।’’
‘‘क्या वे लोग स्वाधीनता पाने योग्य हैं, जो दूसरों को स्वाधीनता देने के लिए प्रस्तुत नहीं? व्यर्थ का असंतोष जताते हुए शक्तिक्षय करने के बदले हम चुपचाप