शत्रुओं के विरूद्व सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ लड़ना सिर्फ लड़ना होता है। विवेकानन्द ने ठीक यही कार्यनीति अपनाई। शत्रुओं के सम्मुख उन्हांेने मूर्ति-पूजा तक की दार्शनिक व्याख्या की और अपनों के सम्मुख कलेजा निकालकर रख दिया और खून के आंसु रोए। परिणाम यह कि उदार बुर्जुआ और उनके बुद्विजीवियों ने विवेकानन्द को प्यार किया, सर आंखों पर बिठाया और उन्हें अपना धार्मिक तथा सांस्कृतिक नेता मान लिया और आ तक माने हुए है। अतएव स्वदेश लौटने
शत्रुओं के विरूद्व सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ लड़ना सिर्फ लड़ना होता है। विवेकानन्द ने ठीक यही कार्यनीति अपनाई। शत्रुओं के सम्मुख उन्हांेने मूर्ति-पूजा तक की दार्शनिक व्याख्या की और अपनों के सम्मुख कलेजा निकालकर रख दिया और खून के आंसु रोए। परिणाम यह कि उदार बुर्जुआ और उनके बुद्विजीवियों ने विवेकानन्द को प्यार किया, सर आंखों पर बिठाया और उन्हें अपना धार्मिक तथा सांस्कृतिक नेता मान लिया और आ तक माने हुए है। अतएव स्वदेश लौटने