योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

प्रति उनके मन में प्रचंड घृणा तथा आक्रोश था। इनके बाद 15 मई, 1896 के पत्र में लिखते हैं, ‘‘थियोसाॅफिस्ट लोगों ने मेरी चापलूसी और मिथ्या प्रशंसा करने का यत्न किया था, क्योंकि भारत में अब मैं नेता माना जाता हूं। इसलिए मेरे लिए यह आवश्यक हो गया कि मैं कुछ बेधड़क और निश्चित शब्दों में उनका खंडन करूं। मैंने यह किया भी और मैं बहुत खुश हूं। यदि मेरा स्वास्थ्य ठीक होता तो मैं इस समय तक इन नये उत्पन्न हुए पाखंडियों का भारत से सफाया कर देता,


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प्रति उनके मन में प्रचंड घृणा तथा आक्रोश था। इनके बाद 15 मई, 1896 के पत्र में लिखते हैं, ‘‘थियोसाॅफिस्ट लोगों ने मेरी चापलूसी और मिथ्या प्रशंसा करने का यत्न किया था, क्योंकि भारत में अब मैं नेता माना जाता हूं। इसलिए मेरे लिए यह आवश्यक हो गया कि मैं कुछ बेधड़क और निश्चित शब्दों में उनका खंडन करूं। मैंने यह किया भी और मैं बहुत खुश हूं। यदि मेरा स्वास्थ्य ठीक होता तो मैं इस समय तक इन नये उत्पन्न हुए पाखंडियों का भारत से सफाया कर देता,


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