कम-से-कम भरसक प्रयत्न तो करता ही।...’’
इसी कड़ी फटकार और इस उत्कट घृणा के बावजुद विवेकानन्द को ख्याति से अपने को लाभान्वित करने के लिए थियोसाॅफिस्ट सम्प्रदाय की चालाक और मक्कार नेत्री एनी बेसेन्ट ने उनकी मृत्यु के बारह बरस बाद मार्च, 1914 की
105 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
‘ब्रह्मवादिन’ पत्रिका में लिखा था, ‘‘महिमामय मूर्ति, गैरिक से भूषित शिकागो नगर के धूममलिन धूसर वृक्ष पर भारतीय सूर्य की तरह दीप्तिमान, उन्नत-सिर मर्मभेदी दृष्टिपूर्ण आंखे,
कम-से-कम भरसक प्रयत्न तो करता ही।...’’
इसी कड़ी फटकार और इस उत्कट घृणा के बावजुद विवेकानन्द को ख्याति से अपने को लाभान्वित करने के लिए थियोसाॅफिस्ट सम्प्रदाय की चालाक और मक्कार नेत्री एनी बेसेन्ट ने उनकी मृत्यु के बारह बरस बाद मार्च, 1914 की
105 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
‘ब्रह्मवादिन’ पत्रिका में लिखा था, ‘‘महिमामय मूर्ति, गैरिक से भूषित शिकागो नगर के धूममलिन धूसर वृक्ष पर भारतीय सूर्य की तरह दीप्तिमान, उन्नत-सिर मर्मभेदी दृष्टिपूर्ण आंखे,