हमारे ध्यान को प्रमुख से हटाकर गौण पर केन्द्रित करके हमारी राष्ट्रीय चेतना को कुंठित करने एवं उसे गलत दिश देने ही का बौद्विक षड्यंत्र नहीं? क्या इसे मित्र वेष में शत्रु की भूमिका के अतिरिक्त और कोई संज्ञा दी जा सकती है? हमें खेद है कि जो व्यक्ति एक ही वस्तु, एक ही प्रवृत्िा तथा एक ही सिद्वान्त में वाद और प्रतिवाद के संघर्ष को नहीं समझते, वे इस षड्यंत्र को भी नहीं समझ पायेंगे। लेकिन विवेकानन्द वाद और प्रतिवाद के एक दूसरे
हमारे ध्यान को प्रमुख से हटाकर गौण पर केन्द्रित करके हमारी राष्ट्रीय चेतना को कुंठित करने एवं उसे गलत दिश देने ही का बौद्विक षड्यंत्र नहीं? क्या इसे मित्र वेष में शत्रु की भूमिका के अतिरिक्त और कोई संज्ञा दी जा सकती है? हमें खेद है कि जो व्यक्ति एक ही वस्तु, एक ही प्रवृत्िा तथा एक ही सिद्वान्त में वाद और प्रतिवाद के संघर्ष को नहीं समझते, वे इस षड्यंत्र को भी नहीं समझ पायेंगे। लेकिन विवेकानन्द वाद और प्रतिवाद के एक दूसरे