जो सदहवादी, युक्तिवादी एवं नास्तिक थे और जो धर्म तथा धर्म के सभी कार्यों को ठगी तथा कुसंस्कार कहकर नकारते थे। वे सब स्वाधीन चिन्तन दल (थ्तमम ज्ीपदामत ैवबपमजल) के सदस्य थे। ये लोग भी विवेकानन्द का विरोध करते थे और मज़ाक उड़ाने में खूब सक्रिय थे। मिशनरियों और थियोसाॅफिस्टों को इनसे भले ही बल मिला, पर इनका विरोध नि‘स्वार्थ, निष्कपट और उन लोगों के विरोध से एकदम भिन्न था। इन लोगों ने एक बार विवेकानन्द को अपने समाज-गृह में भाषण
जो सदहवादी, युक्तिवादी एवं नास्तिक थे और जो धर्म तथा धर्म के सभी कार्यों को ठगी तथा कुसंस्कार कहकर नकारते थे। वे सब स्वाधीन चिन्तन दल (थ्तमम ज्ीपदामत ैवबपमजल) के सदस्य थे। ये लोग भी विवेकानन्द का विरोध करते थे और मज़ाक उड़ाने में खूब सक्रिय थे। मिशनरियों और थियोसाॅफिस्टों को इनसे भले ही बल मिला, पर इनका विरोध नि‘स्वार्थ, निष्कपट और उन लोगों के विरोध से एकदम भिन्न था। इन लोगों ने एक बार विवेकानन्द को अपने समाज-गृह में भाषण