इंगरसोल की यह मित्रता बड़ी विचित्र थी। पर कालीदास के शब्दों में, ‘ज्ञानी ने ज्ञानी को पहली ही वार्ता में पहचान लिया था।’
107 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यों विवेकानन्द को नई दुनिया के उत्कृष्ट विचारशील तत्वों से आदर-सत्कार प्राप्त हुआ और धीरे-धीरे विरोध शान्त हो गया। इस बीच में उन्होंने यह भी अनुभव किया कि अनमेल भीड़ के सम्मुख भाषण देते फिरना व्यर्थ है और व्याख्यान कम्पनी के लोग अधिक से अधिक धन बटोरने की नीयत से उन्हें
इंगरसोल की यह मित्रता बड़ी विचित्र थी। पर कालीदास के शब्दों में, ‘ज्ञानी ने ज्ञानी को पहली ही वार्ता में पहचान लिया था।’
107 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यों विवेकानन्द को नई दुनिया के उत्कृष्ट विचारशील तत्वों से आदर-सत्कार प्राप्त हुआ और धीरे-धीरे विरोध शान्त हो गया। इस बीच में उन्होंने यह भी अनुभव किया कि अनमेल भीड़ के सम्मुख भाषण देते फिरना व्यर्थ है और व्याख्यान कम्पनी के लोग अधिक से अधिक धन बटोरने की नीयत से उन्हें